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Showing posts from March, 2026

हम प्रेम से सबको जोड़ेंगे, मर्यादा को नहीं तोड़ेंगे

हम प्रेम से सबको जोड़ेंगे, मर्यादा को नहीं तोड़ेंगे। संकट कैसा भी विकट घना, कर्तव्य डगर ना छोड़ेंगे ।।  है प्रेम-प्रभु गहरा नाता, अविरल अमृत रस छलकाता। आनंद लहर लहराते है, सत पथ से मुख ना मोड़ेंगे ।। 1।।  है प्रेम-सुखद जीवन धारा, हरती है द्वेष क्लेश सारा। आदर्शों के हम अनुगामी, मृदु सत्य वचन ही बोलेंगे ।। 2।।  है प्रेम-प्रेरणा का सागर, करुणा से अपनी भर गागर। हर प्राण-प्राण हर कण कण में, उत्साह उमंगे घोलेंगे ।। 3।।  है प्रेम-एकता की जननी, अनुपम वैविध्य लिए धरणी। दिव्यांश सभी में जग मग जग, वैभव के नव पथ खोलेंगे ।। 4।।

नित्य करें धरती मां वन्दन, मातु पिता गुरुवर अभिनंदन

नित्य करें धरती मां वन्दन, मातु पिता गुरुवर अभिनंदन, सेवा धरम चले अविराम।-१  श्री राम जय राम जय जय राम-३ चुन चुन कर निज दोष हटायें,  अपना दिव्य रुप प्रगटायें, परहित के हम आयें काम।-२ श्री राम जय राम जय जय राम-३ हे प्रभु हमको ऐसा वर दो, जीवन त्याग तपोमय कर दो, सदा करें हम राम का काम।-३ श्री राम जय राम जय जय राम-३ दया धर्म के सागर हों हम, प्रेम हमारा कभी ना हो कम, तव चरणों में हो विश्राम।-४ श्री राम जय राम जय जय राम-३ अब राम भक्त में भी है दम ख़म, मंदिर भव्य बनायेंगे हम, सदा करे हम संघ का काम।-५ श्री राम जय राम जय जय राम-3

जीवन में सुख दुख का,आना जाना नित्य चले

जीवन में सुख दुख का,आना जाना नित्य चले आना जाना सतत चलें ।। ध्रु.।। हम अपना चैतन्य जगाएं,हम अपना सामर्थ बढ़ाएं। हम अपना कर्तव्य निभाएं,घर-घर मंगल दीप जले। हर घर मंगल दीप जले।। १।। सुख में लिप्त नहीं होना,दुःख में हिम्मत न खोना। धीर-वीर गंभीर बने हम,सारे संकट विघ्न टले।।२।। सुख में भी सब को जोड़ें,दुःख में साथ नहीं छोड़ें। सुख दुःख की समवेत शक्ति से,अपने सब उद्योग फले।।३।। सुख में न जागे अभिमान,दुःख में न भूले निजभान। अच्छा मारग कभी न त्यागे,धर्म का मारग कभी न त्यागे। धर्म का मारग कभी न त्यागे,अनगिन आये कष्ट भले।।४।। सुख में सुंदर देख गगन,दिव्य भास्कर दिव्य किरण। धरती वायु पावन जल से,युग- युग से सब जीव पले।।५।।

भरत भूमि की दशो दिशा में, समरसता का गान हो

  भरत भूमि की दशो दिशा में, समरसता का गान हो  एक ही मंदिर, एक जलाशय, सबका एक श्मशान हो  समरसता का गान हो .............................. ......... हिन्दू सगे है भाई-भाई, कभी पतित नहीं होते है  रामकृष्ण के वंशज है सब इस पर गर्वित होते है  छुआछूत का भेद मिटा दे, सब वर्गों का मान हो एक ही मंदिर, एक जलाशय, सबका एक श्मशान हो  समरसता का गान हो .............................. ......... छुआछूत यदि पाप नहीं तो, जग में कुछ भी पाप नहीं  हिन्दू सहोदर भटक गया तो, इससे बड़ा अभिशाप नहीं  मान जिनका भांग हुआ हो, अब उनका सम्मान हो  एक ही मंदिर, एक जलाशय, सबका एक श्मशान हो  समरसता का गान हो .............................. ......... नर सेवा नारायण सेवा, मन्त्र का जग में गुंजन हो  समरसता का भाव पले, एकलव्य का वंदन हो  कृष्ण सुदामा के घर आये, इसका हमें अभिमान हो  एक ही मंदिर, एक जलाशय, सबका एक श्मशान हो  समरसता का गान हो .............................. .........

धर्म के लिये जिये समाज के लिये जिये

  धर्म के लिये जिये समाज के लिये जिये ये धडकने ये श्वास हो पुण्यभूमी के लिये जन्मभुमि के लिये ॥धृ॥   गर्व से सभी कहे हिन्दु है हम एक है जाति पंथ भिन्नता स्नेह सूत्र एक है शुभ्र रंग की छटा सप्त रंग है लिये ॥१॥   कोटि कोटि कन्ठ से हिन्दु धर्म गर्जना नित्य सिद्ध शक्ति से मातृभू की अर्चना संघ शक्ति कलियुगे सुधा है धर्म के लिये ॥२॥   व्यक्ति व्यक्ति मे जगे समाज भक्ति भावना व्यक्ति को समाज से जोडने की साधना दाव पर सभी लगे धर्म कार्य के लिये ॥३॥   एक दिव्य ज्योति से असंख्य दीप जल रहे कौन लो बुझा सके आंधियो मे जो जले तेजःपुंज हम बढे तमस चेरते हुए ॥४॥  

हमको अपनी भारत की माटी से अनुपम प्यार है ।

हमको अपनी भारत की माटी से अनुपम प्यार है ।  माटी से अनुपम प्यार है । माटी से अनुपम प्यार है ।  इस माटी पर जन्म लिया था, दशरत नंदन राम ने ।  इस माटी पर गीता गायी, युद्धकुल भूषण श्याम ने ।  इस माटी के आगे झुकता, मस्तक बारम्बार है ।।  हमको अपनी_ _ _ _ _ _ _ _  इस माटी की गौरव गाथा गायी राजस्थानी ने ।  इसे बनाया वीरो ने, अपने पवन बलिदान से ।  मीरा के गीतों की, इसमें छिपी हुई झंकार हे ।।  हमको अपनी _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _  कण - २ मंदिर इस माटी का कण - २ में भगवान है ।  इस माटी का तिलक करो, यह मेरा हिंदुस्तान है ।  इस माटी का रोम रोम पहरे दार है ।।  हमको अपनी _ _ _ _ _ _ _ _ _ 

हम विजय की ओर बढते जा रहे संगठन का भाव भरते जा रहे

 हम विजय की ओर बढते जा रहे संगठन का भाव भरते जा रहे   यह सनातन राष्ट्र मंदिर है यहाँ वेद की पावन ऋचाये गूंजती प्रकृति का वरदान पाकर शक्तियाँ देव निर्मित इस धरा को पूजती हम स्वयं देवत्व गढ़ते जा रहे हम विजय की ओर बढते जा रहे   राष्ट्र की जो चेतना सोइ पड़ी हम उसे फिर से जगाने आ गये परम पौरुष की पताका हाथ ले क्रान्ति के नव गीत गाने आ गए विघ्न बाधा शैल चढ़ते जा रहे हम विजय की ओर बढते जा रहे   हम युवाओ का करे आव्हान फिर शक्ति का नवज्वार पैदा हो सके राष्ट्र रक्षा का महाअभियान ले संगठन भी तीव्रगामी हो सके लक्ष्य का संधान करते जा रहे हम विजय की ओर बढते जा रहे   हम विजय की ओर बढते जा रहे संगठन का भाव भरते जा रहे

भारतमाता तेरा आँचल हरा भरा धानी धानी

 भारत माता तेरा आँचल, हरा भरा धानी धानी।  मीठा मीठा चम् चम् करता, तेरी नदियों का पानी।। हरी हो गयी बंजर धरती, नाचे झरनों में बिजली । सोना चांदी उगल रहे है, तेरी नदियों का पानी ।।1।। भारत माता तेरा आँचल, हरा भरा धानी धानी तेरा मन बढ़ाने वाले, है तेरे जग के रखवाले । तेरे ऊँचे ऊँचे पर्वत, निडर बहादुर सेनानी ।।2।। भारत माता तेरा आँचल, हरा भरा धानी धानी  मस्त हवा जब लहराती है, दूर दूर तक पहुंचाती है । मन को मीत बनाने वाली, मधुर मधुर तेरी वाणी ।।3।। भारत माता तेरा आँचल, हरा भरा धानी धानी  जीवन पुष्प चढ़ा चरणों में, मांगे मातृ भूमि से यह वर। तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे ना रहे ।।4।। भारत माता तेरा आँचल, हरा भरा धानी धानी । मीठा मीठा चम् चम् करता, तेरी नदियों का पानी ।।

जाग उठे हम हिंदू फिर से विजय ध्वजा पहराने

 जाग उठें हम हिंदू फिर से विजय ध्वजा फहराने। अंगड़ाई ले चलें पुत्र है  माँ  के कष्ट मिटाने॥ जिनके पुरखे महा यशस्वी वे फिर क्यों घबराएं। जिनके सुत अतुलित बलशाली शौर्य गगन पर छायें। लेकर शस्त्र शास्त्र को कर में शत्रु ह्रदय दहलाने॥१॥ हम अगस्त्य बन महा सिंधु को संजुलि में पी जाएँ। तीन डगों में  सृष्टि नाप ले कालकूट पी जाएँ। पृथ्वी के हम अमर पुत्र हैं जग को चले जगाने ॥२॥ हिन्दु भाव को जब जब भूले आई विपद महान। भाई छूटे धरती खोई मिट गये धर्मस्थान। भूलें छोड़े और गुंजा दें जय से भरे तराने॥३॥

व्यक्ती व्यक्ती मे जगाये राष्ट्र चेतना

व्यक्ती व्यक्ती मे जगाये राष्ट्र चेतना जनमन संस्कार करे यही साधना । साधना नित्य साधना साधना अखंड साधना ॥ध्रु॥   नित्य शाखा जान्हवी पुनीत जलधरा साधना की पुण्यभूमी शक्ति पीठीका रजः कणों में प्रकटें दिव्य दीपमालिका हो तपस्वी के समान संघ साधना ॥१॥     हे प्रभो तू विश्व की अजेय शक्ति  दे जगत हो विनम्र ऐसा शील हमको दे कष्ट से भरा हुआ ये पंथ काटने ज्ञान दे की हो सरल हमारी साधना ॥२॥     विजयशाली संघबद्ध कार्य शक्ति दे तीव्र और अखंड ध्येय निष्ठा हमको दे हिंदु धर्म रक्षणार्थ वीर व्रत स्फ़ुरे तव कृपा से हो सरल हमारी साधना ॥३॥  

स्वयं अब जागकर हमको, जगाना देश है अपना

 स्वयं अब जागकर हमको, जगाना देश है अपना| जगाना देश है अपना, जगाना देश है अपना || हमारे देश की मिट्टी, हमें प्राणों से प्यारी हैं,  यहीं के अन्न जल वायु, परं श्रद्धा हमारी है | स्वभाषा है हमें प्यारी, औ प्यारा देश है अपना  जगाना देश है अपना ........  नहीं है अब समय कोई, गहन निद्रा में सोने का, समय है एक होने का, न मतभेदों में खोने का | बढ़े बल राष्ट्र का जिससे, वो करना मेल है अपना  जगाना देश है अपना ........ जतन हो संगठित हिन्दू, वो सक्रिय भाव भरने का, जगाने राष्ट्र की भक्ति,  उत्तम कार्य करने का | समुन्नत राष्ट्र हो भारत, यही उद्देश्य है अपना  जगाना देश है अपना ........

निर्मल पावन भावना, सभी के सुख की कामना

निर्मल पावन भावना, सभी के सुख की कामना गौरवमय समरस जन-जीवन, यही राष्ट्र आराधना चले निरंतर साधना ………… २ जहाँ अशिक्षा अंधकार है, वहाँ ज्ञान का दीप जलाये स्नेह भरी अनुपम शैली से, संस्कार की जोत जगायें सभी को लेकर साथ चलेंगे, दुर्बल का कर थामना चले निरंतर साधना ………… २ जहाँ व्याधियों और अभावों, में मानवता तडप रही घोर विकारों अभिशापों से, देखो जगती झुलस रही एक एक आँसू को पोछें, सारी पीड़ा लांघना चले निरंतर साधना ………… २   जहाँ विषमता भेद अभी है, नई चेतना भरनी है न्यायपूर्ण मर्यादा धारें, विकास रचना करनी है स्वाभिमान से खड़े सभी हों, करे न कोई याचना चले निरंतर साधना ………… २ नर सेवा नारायण सेवा, है अपना कर्तव्य महान अपनी भक्ति अपनी शक्ति से  हरना है जन-जन का त्राण अपने तप से प्रगटायेंगे, माँ  भारत कमलासना चले निरंतर साधना ………… २

श्रद्धामय विश्वास बढ़ाकर सामाजिक सद्भाव जगाये

 श्रद्धामय विश्वास बढ़ाकर, सामाजिक सद्भाव जगायें ।  अपने प्रेम परिश्रम के बल, भारत में नव सूर्य उगायें ॥  जाग रहा है जन-गण-मन ! निश्चित होगा परिवर्तन... शुद्ध सनातन परम्परामय, प्रेम भरा व्यवहार रहे ।  ऋषि-मुनियों की शिक्षाओं पर,चलने का संस्कार रहे ॥  राह रपटती इस दुनिया में, कुल-कुटुम्ब का संरक्षण  निश्चित होगा परिवर्तन... सब समाज अंगांग परस्पर, छुआछूत लवलेश न हो ।  प्रीति-रीति भर गहन सभी में, भेदभाव अवशेष न हो ॥  बनें परस्पर पूरक-पोषक, हदयों में रस-धार सृजन  निश्चित होगा परिवर्तन... हरी-भरी हो धरती अपनी, मिट्टी का भी हो पोषण ।  पंच तत्व की मंगल महिमा, दिव्य धरा के आभूषण ॥  पुरखों के विज्ञान-धर्म की, परम्परा का को वरण  निश्चित होगा परिवर्तन... स्वाभिमान भर, भाव स्वदेशी, स्वत्व बोध का ले आधार ।  परहित ध्यान परस्पर पूरक, जन-जीवन का शिष्टचार ॥  विश्व मंच पर भारत माँ के, यश की हो अनुगूँज सघन  निश्चित होगा परिवर्तन...

युगो युगो से दुनिया चलती जिसके दिव्य प्रकाश में

  * सामूहिक गीत * युगों युगों से दुनिया चलती, जिसके दिव्य प्रकाश में पुरखों की वह पौरुष गाथा, अजर अमर इतिहास में भारत के इतिहास में, भारत के इतिहास में। धु।। अपना बल ही अपना वैभव कुरुक्षेत्र मैदानों में विजय लिखी थी खड्ग नोकों से, शक हूणी तूफानों में हार नहीं जय विजय पराक्रम, पुरखों के पुरुषार्थ में।।1।। भारत के इतिहास में, भारत के इतिहास में। धु।। राज्य सैकड़ों रहा विदेशी पर अखंड यह परिपाटी। मिटा मिटाने वाला इसको तेजोमय इसकी माटी। अमर अमित हिंदू संस्कृति है जल थल में आकाश में।।2।। भारत के इतिहास में, भारत के इतिहास में। धु।। भौतिकता से त्रस्त विश्व की, एकमात्र भारत आशा। परमानंद शांति की जननी, पूर्ण करेगी अभिलाषा। राष्ट्र संगठित बने मील के, पत्थर विश्व विकास में।।3।। भारत के इतिहास में, भारत के इतिहास में। धु।। व्यष्टि समष्टि सृष्टि जीवन में, कलीमल आहत मर्यादा। हिंदू संस्कृति संस्कारों में, दूर करेगी हर बाधा। पवित्र पावनी संस्कृति गंगा, जनमन हृदयाकाश में।।4।। भारत के इतिहास में, भारत के इतिहास में। धु।।

आओ हम सब भारतवासी चले इस डगरिया

आओ हम सब भारतवासी चले इस डगरिया  पांच प्रणो से हम-सब लाये, इक नई उजरिया    समरसता सद्भाव जगाने घर घर अलख जगानी है  हिन्दू न कोई ऊंचा-नीचा, सभी सहोदर भाई है  एक रहेंगे सेफ रहेगे, समझे यह नजरिया  आओ हम सब भारतवासी चले इस डगरिया पांच प्रणो से हम-सब लाये, इक नई उजरिया   ।।१।। पानी-पर्वत-पेड़-प्रकृति-पर्यावरण बचायेगे  सिंगल यूज प्लास्टिक को हम कभी नहीं अपनायेगे  हरी-भरी सुन्दर धरती कर, बढ़ाये हम उमरिया  आओ हम सब भारतवासी चले इस डगरिया पांच प्रणो से हम-सब लाये, इक नई उजरिया   ।।२।। स्व का भाव जगेगा भारत, विश्वगुरु बन जाएगा  स्वावलंबन से स्वदेश का, वैभव बढ़ता जायेगा  भारत माँ सिर मुकुट सजेगा, स्वदेशी चुनरियाँ  आओ हम सब भारतवासी चले इस डगरिया पांच प्रणो से हम-सब लाये, इक नई उजरिया   ।।३।। आधुनिकता के इस युग में, नैतिकता ना होवे कम  भाषा-भूषा-भवन-भ्रमण में संस्कार ना भूले हम  मिल-जुल-कर परिवार रहे ज्यों, फूलो की टोकरियाँ  आओ हम सब भारतवासी चले इस डगरिया पांच प्रणो से हम-सब लाये, इक नई उजरिया...